आगर मालवा। जिले में निराश्रित और खुले में घूम रहे गोवंश की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। शहर के प्रमुख मार्गों, बाजार क्षेत्रों, डिवाइडरों और हाईवे पर बड़ी संख्या में गोवंश बैठे और घूमते नजर आ रहे हैं। सड़क के बीच या डिवाइडर पर बैठे पशुओं के कारण जहां यातायात प्रभावित हो रहा है, वहीं तेज रफ्तार वाहनों से टकराव का खतरा भी बना हुआ है। इसके बावजूद सड़क से गोवंश हटाने और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की व्यवस्था प्रभावी रूप से नजर नहीं आ रही है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुछ दिन पूर्व आमला क्षेत्र में सड़क पर मौजूद गोवंश को तेज रफ्तार वाहन ने टक्कर मार दी थी। हादसे में पांच गोवंश की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हुए। घटना के बाद ग्रामीणों ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए थे। इसके बावजूद जिले के अन्य प्रमुख मार्गों पर गोवंश के जमावड़े की तस्वीर में खास बदलाव नजर नहीं आ रहा है।
सरकारी आंकड़ों में पहले ही सामने आ चुकी है समस्या
20वीं पशुधन गणना-2019 के अनुसार आगर-मालवा जिले में 5,571 आवारा गोवंश दर्ज किए गए थे। यह आंकड़ा पुराना है और वर्तमान 2026 में सड़कों पर मौजूद गोवंश की वास्तविक संख्या नहीं दर्शाता, लेकिन इससे जिले में निराश्रित पशुओं की समस्या के पुराने स्वरूप का अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है।
वर्षों बाद भी यदि शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों और प्रमुख मार्गों पर बड़ी संख्या में गोवंश खुले में दिखाई दे रहे हैं तो सवाल यह है कि अब तक किए गए व्यवस्थापन और सरकारी योजनाओं का असर जमीन पर कितना हुआ है।
सालरिया गो-अभयारण्य में 6,661 गोवंश
आगर-मालवा के सुसनेर क्षेत्र स्थित सालरिया गो-अभयारण्य में निराश्रित गोवंश के संरक्षण की बड़ी व्यवस्था है। फरवरी 2026 में विधानसभा में दी गई सरकारी जानकारी के अनुसार 472.63 हेक्टेयर क्षेत्र में संचालित इस गो-अभयारण्य में 6,661 गोवंश मौजूद थे।
इसके अलावा जिले में विभिन्न स्तरों पर गौशालाओं के माध्यम से भी गोवंश के व्यवस्थापन की व्यवस्था है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब जिले में इतने बड़े स्तर पर गोवंश के लिए आश्रय की व्यवस्था उपलब्ध है, तो मुख्य सड़कों और डिवाइडरों पर लगातार गोवंश के झुंड क्यों दिखाई दे रहे हैं।
सड़क से हटाए गए 1,200 गोवंश, फिर वही स्थिति
दिसंबर 2024 में विधानसभा में दिए गए सरकारी जवाब में बताया गया था कि आगर-मालवा जिले में सड़कों पर विचरण करने वाले करीब 1,200 गोवंश को सालरिया गो-अभयारण्य में व्यवस्थापित किया गया।
सरकारी स्तर पर सड़क से गोवंश हटाने की कार्रवाई किए जाने के बावजूद यदि आज भी प्रमुख मार्गों पर बड़ी संख्या में पशु नजर आ रहे हैं तो यह व्यवस्था की निरंतरता और निगरानी पर सवाल खड़ा करता है। केवल एक बार पशुओं को सड़क से हटाना पर्याप्त नहीं है। उनके दोबारा सड़क पर पहुंचने की स्थिति रोकने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है।
गौशालाएं मौजूद, फिर सड़क पर क्यों हैं पशु?
प्रदेश में गौशालाओं के संचालन और गोवंश के संरक्षण को लेकर सरकार द्वारा विभिन्न व्यवस्थाएं की गई हैं। फरवरी 2026 में विधानसभा में सरकार ने प्रदेश में 3,040 संचालित गौशालाओं में करीब 4.80 लाख गोवंश होने की जानकारी दी थी।
सरकार ने आवारा पशुओं के संवेदनशील स्थानों की मैपिंग, रोड साइन बोर्ड, पेट्रोलिंग तथा केटल लिफ्टिंग वाहनों जैसी व्यवस्थाओं की भी जानकारी दी है।
इसके बावजूद आगर-मालवा में सड़कों पर दिखाई दे रही स्थिति इन व्यवस्थाओं के स्थानीय स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन और नियमित निगरानी पर सवाल खड़े करती है।
हादसे के बाद जागने की बजाय पहले से क्यों नहीं व्यवस्था?
सड़क पर बैठे गोवंश को हटाने के लिए प्रशासन और स्थानीय निकायों को नियमित अभियान चलाने की जरूरत है। खासकर रात के समय हाईवे और प्रमुख मार्गों पर स्थिति अधिक खतरनाक हो जाती है। अंधेरे में सड़क पर बैठे पशु वाहन चालकों को समय पर दिखाई नहीं देते और अचानक सामने आने पर दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है।
आमला में हुई घटना ने इस खतरे को सामने ला दिया है। ऐसे में अब प्रशासन के सामने चुनौती केवल गोवंश को सड़क से हटाने की नहीं, बल्कि उन्हें दोबारा सड़क पर आने से रोकने की स्थायी व्यवस्था करने की भी है।
पशुपालकों की जिम्मेदारी भी तय हो
सड़कों पर दिखाई देने वाला प्रत्येक गोवंश निराश्रित हो, यह जरूरी नहीं है। कई पशुपालक अपने पशुओं को खुले में छोड़ देते हैं, जिसके बाद वे सड़क और बाजार क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। ऐसी स्थिति में पशुपालकों की जिम्मेदारी तय करना भी आवश्यक है।
प्रशासन को निराश्रित गोवंश के लिए आश्रय की व्यवस्था के साथ-साथ खुले में पशु छोड़ने वाले पशुपालकों की पहचान और नियमानुसार कार्रवाई पर भी ध्यान देना होगा।
प्रशासन के सामने कई सवाल
गोवंश संरक्षण और सड़क सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं के बावजूद जिले में मौजूदा स्थिति कई सवाल खड़े करती है—
क्या जिले में वर्तमान में सड़कों पर घूम रहे गोवंश की वास्तविक संख्या का सर्वे हुआ है?
जिले की सभी गौशालाओं की कुल क्षमता कितनी है और उनमें वर्तमान में कितने गोवंश हैं?
सड़कों से हटाए गए गोवंश की नियमित निगरानी की क्या व्यवस्था है?
आमला जैसे संवेदनशील स्थानों को चिन्हित कर वहां विशेष निगरानी क्यों नहीं की जा रही?
रात के समय प्रमुख मार्गों और हाईवे पर गोवंश को हटाने के लिए नियमित अभियान क्यों नहीं चलाया जा रहा?
अब कार्रवाई हादसे के बाद नहीं, पहले जरूरी
गोवंश का सड़कों पर जमावड़ा केवल पशु सुरक्षा का विषय नहीं है। इससे वाहन चालकों और राहगीरों की सुरक्षा भी सीधे जुड़ी है। एक ओर सड़क पर बैठे पशु हादसे का शिकार हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें बचाने के प्रयास में वाहन अनियंत्रित होने की आशंका बनी रहती है।
आमला की घटना के बाद अब प्रशासन के सामने स्पष्ट चुनौती है कि सड़क पर गोवंश के जमावड़े को रोकने के लिए कागजी व्यवस्थाओं से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर नियमित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
गौशालाएं, गो-अभयारण्य और व्यवस्थापन की योजनाएं तभी प्रभावी मानी जाएंगी, जब उनका असर सड़कों पर भी दिखाई दे। फिलहाल सड़कों पर गोवंश के झुंड और उनके बीच से गुजरते वाहन यह सवाल जरूर खड़ा कर रहे हैं कि व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद समस्या खत्म क्यों नहीं हो रही?


